दिल्ली: भैया, कुछ दिन पहले तक भीषण गर्मी और हीटवेव ने पूरे देश को बेहाल कर रखा था। लेकिन फिर जुलाई के पहले हफ्ते में मानसून ने गियर बदला और लगातार नौ दिनों तक ऐसी झमाझम बारिश हुई कि लोगों ने सोचा चलो, अब तो राहत मिलेगी! लेकिन जनाब, ये राहत लगता है ज्यादा दिनों की मेहमान नहीं है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग यानी IMD ने एक ऐसी चेतावनी जारी कर दी है, जिसने सबकी टेंशन बढ़ा दी है।
IMD का कहना है कि प्रशांत महासागर में अल नीनो (El Niño) अपनी ताकत बढ़ा रहा है और इसकी वजह से जुलाई के मध्य से देश में मानसून फिर से कमजोर पड़ सकता है। सोचिए, एक तरफ किसान भाई-बहन अच्छी बारिश की आस लगाए बैठे हैं और दूसरी तरफ ये खबर।
ये किसी बड़े झटके से कम नहीं है, है कि नहीं?
मौसम विभाग के एक्सपर्ट्स के मुताबिक, वायुमंडलीय कंडीशंस में अचानक कुछ बदलाव आ रहे हैं, जिनके चलते जुलाई के बीच से लेकर अगस्त तक मानसूनी सीजन दोबारा धीमा पड़ सकता है। अगर ऐसा हुआ तो पानी की कमी और खेती-किसानी पर इसका बड़ा असर देखने को मिल सकता है।
जुलाई की शुरुआत में आखिर क्या कमाल हुआ था?
अब थोड़ा फ्लैशबैक में चलते हैं। जून का महीना तो मॉनसून के लिए थोड़ा सुस्त रहा था, लेकिन जुलाई की शुरुआत धमाकेदार थी।
पहले हफ्ते में पश्चिमी, मध्य और पूर्वी भारत में इतनी जोरदार बारिश हुई कि देश में बारिश की कमी यानी डेफिसिट में काफी गिरावट दर्ज की गई। इस बारिश से एक नहीं, कई फायदे हुए।
सबसे पहले तो देश के बड़े-बड़े जलाशयों में पानी का लेवल सुधर गया, जिससे आने वाले दिनों के लिए एक उम्मीद जगी। दूसरा, कई राज्यों में खरीफ फसलों की बुआई को भी रफ्तार मिल गई।
किसान जो पहले परेशान थे, उन्हें थोड़ी राहत मिली। हालांकि, कुछ ऐसे भी इलाके थे जहां सिर्फ छिटपुट बारिश हुई और स्थिति जस की तस बनी रही, लेकिन कुल मिलाकर माहौल पॉजिटिव हो गया था।
अल नीनो फिर क्यों बन गया है बड़ी टेंशन?
आप सोच रहे होंगे कि ये अल नीनो है क्या बला, जो हमारे मानसून को बार-बार परेशान करता है? IMD का अनुमान है कि इस दक्षिण-पश्चिम मानसून सीजन में अल नीनो की स्थितियां और ज्यादा मजबूत होने वाली हैं। आसान भाषा में समझें तो, अल नीनो प्रशांत महासागर के बीच और पूर्वी हिस्सों में समुद्र की सतह के तापमान का असामान्य रूप से गर्म हो जाना है।
जब ऐसा होता है, तो इसका सीधा असर इंडियन सबकॉन्टिनेंट यानी भारतीय उपमहाद्वीप की ओर आने वाली नमी वाली हवाओं पर पड़ता है। ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं, और नतीजा ये होता है कि हमारे दक्षिण-पश्चिम मानसून को भारी नुकसान पहुंचता है, यानी बारिश कम हो जाती है।
सिर्फ अल नीनो ही नहीं, वैज्ञानिक मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन (MJO) नाम के एक और फैक्टर पर भी नजर रख रहे हैं। यह भी एक ऐसे फेज में एंटर करने वाला है जो भारतीय उपमहाद्वीप में ज्यादा बारिश के लिए अनुकूल नहीं माना जाता।
13 जुलाई के बाद कैसा रह सकता है मौसम का मिजाज?
अलग-अलग वेदर मॉडल्स जो संकेत दे रहे हैं, उनके हिसाब से मानसून का यह सक्रिय चरण, जिसका हमने अभी आनंद लिया, वह 13 जुलाई के आसपास कमजोर पड़ सकता है। मौसम विज्ञानियों को आशंका है कि इस दौरान बंगाल की खाड़ी के ऊपर कम दबाव की प्रणालियां उतनी नहीं बनेंगी जितनी मानसून को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी होती हैं।
इसका सीधा मतलब ये होगा कि देश के भीतर नमी का आना कम हो जाएगा और मानसूनी गतिविधियों पर एक तरह से 'टेंपरेरी ब्रेक' लग सकता है। आने वाले करीब पंद्रह दिनों के दौरान पश्चिमी, दक्षिणी और मध्य भारत के कुछ हिस्सों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की जा सकती है, जो इन इलाकों के लिए चिंता का विषय है।
अल नीनो के इस झटके से कौन से राज्य होंगे सबसे ज्यादा प्रभावित?
अगर मौसम विभाग का यह पूर्वानुमान बिल्कुल सटीक बैठता है, तो देश के कई अहम क्षेत्रों पर इसका सीधा और गहरा असर पड़ने की संभावना है। जिन राज्यों को इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होने की लिस्ट में रखा गया है, उनमें महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और केरल जैसे राज्य शामिल हैं।
इन राज्यों में किसानों की चिंता और बढ़ सकती है, क्योंकि उनकी खरीफ फसलें सीधे तौर पर मानसून पर निर्भर करती हैं। पानी की कमी और सूखे जैसी स्थितियां पैदा होने का भी डर बना रहेगा।
कुल मिलाकर, IMD की यह चेतावनी उन सभी लोगों के लिए एक वेक-अप कॉल है जो अच्छी बारिश के भरोसे बैठे हैं। अब देखना होगा कि आने वाले दिनों में मानसून कैसा बिहेव करता है और अल नीनो का असर कितना गहरा होता है।
मौसम विभाग अपनी नजर बनाए हुए है और हम तक लगातार अपडेट पहुंचाता रहेगा।





































