तकनीक डेस्क: साल 1999 में एक शख्स ने कुछ ऐसा कहा था, जो उस वक्त तो शायद लोगों को अजीब लगा हो, लेकिन आज की डिजिटल दुनिया में वो बात बिल्कुल सच लगती है। हम बात कर रहे हैं सन माइक्रोसिस्टम्स (Sun Microsystems) के तत्कालीन CEO स्कॉट मैकनीली (Scott McNealy) की। उन्होंने कहा था, "आपकी प्राइवेसी वैसे भी ज़ीरो है। इसे स्वीकार करें।" सोचिए, ये बात आज से 25 साल पहले कही गई थी, जब स्मार्टफोन नहीं थे, सोशल मीडिया नाम की कोई चीज नहीं थी और इंटरनेट आज जितना व्यापक नहीं था।
ये बयान तब आया था जब डिजिटल सिस्टम्स बस पैर पसारना शुरू कर रहे थे, और शायद मैकनीली को भविष्य की आहट सुनाई दे गई थी। आज जब हम हर जगह अपने डेटा का इस्तेमाल होते देखते हैं, तो उनका ये बेबाक बयान और भी ज़्यादा मायने रखता है।
आखिर 1999 में ये बात क्यों कही गई थी?
बता दें कि सन माइक्रोसिस्टम्स उस दौर की एक बड़ी टेक कंपनी थी, और स्कॉट मैकनीली सिलिकॉन वैली के शुरुआती दिग्गजों में से एक थे। वो अपनी बेबाकी और बोल्ड बयानों के लिए जाने जाते थे।
जब उनकी कंपनी ने अपना एक नया सिस्टम लॉन्च किया, तो यूजर डेटा और प्राइवेसी को लेकर सवाल उठने लगे। एक अनौपचारिक Q&A सेशन के दौरान, जब पत्रकारों ने Jini प्लेटफॉर्म से यूजर प्राइवेसी को संभावित खतरे के बारे में पूछा, तो मैकनीली ने बिना किसी हिचकिचाहट के जवाब दिया:
"आपकी प्राइवेसी वैसे भी ज़ीरो है। इसे स्वीकार करें।
" — स्कॉट मैकनीली, जनवरी 1999
उनके इस बयान ने उस वक्त काफी हंगामा मचाया था, लेकिन आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो कहीं न कहीं उस बात में एक कड़वा सच छुपा हुआ दिखता है। मैकनीली ने उस समय ही वो बात कह दी थी, जो आज हमारे स्मार्टफोन और इंटरनेट की दुनिया में एक कड़वी हकीकत बन चुकी है।
क्या था ये Jini सिस्टम, जिसने प्राइवेसी पर सवाल उठाए?
Jini एक ऐसा सिस्टम था जिसे स्मार्ट होम और स्मार्ट ऑफिस के सपने को साकार करने के लिए डिज़ाइन किया गया था। इसका मकसद था कि अलग-अलग डिवाइस आपस में बिना किसी दिक्कत के बात कर सकें, एक-दूसरे के रिसोर्स साझा कर सकें।
इसका मतलब था कि आपको किसी कॉन्फ़िगरेशन, ड्राइवर इंस्टॉलेशन या इंसानी दखल की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। सब कुछ अपने आप कनेक्ट हो जाता।
सुनने में तो ये कमाल का कॉन्सेप्ट लगता है, है ना?
लेकिन इस सिस्टम की एक बड़ी दिक्कत ये थी कि इसे काम करने के लिए लगातार डेटा अपलोड करने और नेटवर्कों पर जगह 'लीज़' करने की ज़रूरत पड़ती थी। कुल मिलाकर, Jini सिस्टम एक बड़ा डिजिटल फुटप्रिंट बनाता था, यानी यूज़र्स की हर गतिविधि का एक विस्तृत रिकॉर्ड।
यहीं से प्राइवेसी को लेकर सवाल उठने शुरू हुए। हालांकि Jini अपने आप में एक रिवोल्यूशनरी कॉन्सेप्ट था, पर कुछ बड़ी हार्डवेयर दिक्कतों की वजह से ये मार्केट में अपनी जगह नहीं बना पाया और आखिरकार फेल हो गया।
McNealy के बयान पर क्या बवाल हुआ?
ज़ाहिर है, मैकनीली के इस बयान ने प्राइवेसी की वकालत करने वालों और एक्टिविस्ट्स को काफी नाराज़ किया। इलेक्ट्रॉनिक फ्रंटियर फाउंडेशन (Electronic Frontier Foundation) की तत्कालीन अध्यक्ष लोरी फेना (Lori Fena) ने उनके बयान को "पूरी तरह से गैर-जिम्मेदाराना" करार दिया था।
लोगों का कहना था कि एक बड़ी कंपनी का CEO इस तरह की बातें करके यूज़र्स की प्राइवेसी को हल्के में ले रहा है।
हालांकि मैकनीली के बयान पर उस समय चाहे जितनी आलोचना हुई हो, लेकिन उनके शब्दों में एक 'सच्चाई का अंश' ज़रूर था। पिछले कुछ सालों में, तकनीक इंडस्ट्री की दिशा लगातार यूज़र डेटा जमा करने की तरफ ही बढ़ी है।
कंपनियां इस डेटा का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर प्रोफाइल बनाने के लिए करती हैं, जिसका मुख्य मकसद विज्ञापन और मार्केटिंग होता है। ये एक ऐसा ट्रेंड है जो आज भी बदस्तूर जारी है।
आज जब आप कोई ऐप डाउनलोड करते हैं, कोई वेबसाइट खोलते हैं या सोशल मीडिया पर कुछ भी पोस्ट करते हैं, तो आपकी एक्टिविटीज़ लगातार ट्रैक होती रहती हैं। ये सब हमारी डिजिटल लाइफ का एक अभिन्न अंग बन चुका है।
मैकनीली ने जो बात 1999 में कही थी, वो आज के दौर की कड़वी हकीकत बन चुकी है। उनका वो बयान एक तरह से भविष्य का आइना था, जो हमें दिखा रहा था कि आगे क्या होने वाला है।
हालांकि हम अपनी प्राइवेसी को लेकर जागरूक ज़रूर रहते हैं, लेकिन ये भी सच है कि डिजिटल दुनिया में 'ज़ीरो प्राइवेसी' वाली बात कई मायनों में सच होती दिख रही है। यह दिखाता है कि कैसे कुछ दूरदर्शी लोग भविष्य की चुनौतियों को समय से पहले भांप लेते हैं, भले ही उनकी बातें उस वक्त लोगों को अटपटी क्यों न लगें।



































