दुनिया भर से: सोलर पैनल का नाम सुनते ही दिमाग में आता है चीन। दुनिया के कोने-कोने में चीन के बनाए सोलर पैनल छाए हुए हैं। इसकी एक बड़ी वजह रही है कि चीन ने दुनिया को एकदम सस्ते और धड़ाधड़ सोलर पैनल दिए। लेकिन अब इस कहानी में एक बड़ा ट्विस्ट आ गया है। ड्रैगन ने अपने ही सोलर उद्योग के लिए ऐसे कड़े नियम बना दिए हैं, जो कमज़ोर और ऊर्जा ज्यादा खपत करने वाले पैनल को सीधे-सीधे बाजार से बाहर कर देंगे। समझिए कि चीन अब 'क्वांटिटी' से हटकर 'क्वालिटी' और 'दक्षता' पर फोकस करने वाला है।
ये कोई छोटी-मोटी बात नहीं है, ये दुनिया भर के सोलर बाजार में भूचाल ला सकती है। क्योंकि अब वो दौर शायद खत्म होने वाला है जब बेहद सस्ते सोलर पैनल हर जगह आसानी से उपलब्ध थे।
चीन का यह कदम एक तरह से 'एक युग के अंत' का संकेत दे रहा है, जहां सस्ते दाम पर कॉम्पिटिशन की जगह अब 'एफिशिएंसी' और 'तकनीकी मजबूती' का बोलबाला होगा।
आखिर चीन को यह कदम क्यों उठाना पड़ा?
आपको बता दें, चीन कई सालों से सोलर पैनल बनाने में दुनिया का लीडर रहा है। उन्होंने इतनी बड़ी मात्रा में पैनल बनाए कि कीमतें एकदम जमीन पर आ गईं।
इससे बाकी देशों के सोलर निर्माताओं के लिए कंपीट करना मुश्किल हो गया। लेकिन इस अंधाधुंध उत्पादन का एक काला सच भी था।
कई कंपनियां पुराने और कम एफिशिएंट तरीकों से पॉलीसिलिकॉन (polysilicon) और वेफर्स (wafers) बना रही थीं, जिनमें ऊर्जा की खपत बहुत ज्यादा होती थी। इससे पर्यावरण पर भी असर पड़ रहा था और क्वालिटी को लेकर भी सवाल उठ रहे थे।
सरल भाषा में कहें तो, बहुत सारी कंपनियां घटिया माल बनाकर बस सस्ता बेच रही थीं। सरकार को लगा कि यह सिर्फ देश के सोलर उद्योग की छवि खराब कर रहा है, बल्कि इससे लंबे समय में स्थिरता भी नहीं मिलेगी और देश को ऊर्जा दक्षता के अपने लक्ष्यों को पाने में दिक्कत होगी।
चीन अब चाहता है कि उसके सोलर प्रोडक्ट सिर्फ सस्ते न हों, बल्कि बेस्ट इन क्लास भी हों।
कौन से नियम लाए गए हैं और कब से होंगे लागू?
चीन ने सोलर उद्योग में एनर्जी एफिशिएंसी को लेकर तीन नए 'मैन्डेटरी स्टैंडर्ड' जारी किए हैं। मैन्डेटरी मतलब, इन्हें मानना अब हर कंपनी के लिए कंपलसरी होगा, कोई ऑप्शन नहीं है।
ये नियम 1 जनवरी 2027 से लागू हो जाएंगे और पूरे फोटोवोल्टिक (Photovoltaic - PV) सप्लाई चेन पर असर डालेंगे। इसमें पॉलीसिलिकॉन से लेकर सिलिकॉन वेफर्स, मॉड्यूल (modules) और इनवर्टर (inverters) तक सब शामिल है।
ये तीन नियम हैं – GB 29447-2026, GB 47835-2026, और GB 47834-2026। अब तक चीन में सोलर उत्पादन को लेकर कुछ 'वॉलंटरी गाइडलाइंस' थीं, यानी कंपनियां अपनी मर्जी से उन्हें मानती थीं या नहीं मानती थीं।
लेकिन ये नए नियम 'बाध्यकारी' हैं, यानी कंपलसरी। इसका सीधा असर उत्पादन (production), खरीद (procurement), आयात (imports) और रिन्यूएबल एनर्जी (renewable energy) प्रोजेक्ट्स के फैसलों पर पड़ेगा।
पॉलीसिलिकॉन बनाने वाली कंपनियों पर क्या असर होगा?
इन नियमों में से GB 29447-2026 खास तौर पर पॉलीसिलिकॉन और जर्मेनियम (Germanium) उत्पादन पर फोकस करता है। यह प्रमुख विनिर्माण प्रक्रियाओं के लिए ऊर्जा खपत की सीमाओं को कड़ा करता है।
इसका सीधा सा मतलब है कि जो पुरानी पॉलीसिलिकॉन सुविधाएं ज्यादा बिजली खाती हैं, उन पर इन नियमों का तगड़ा दबाव पड़ेगा। उन्हें या तो अपनी तकनीक अपग्रेड करनी पड़ेगी या फिर बाजार से बाहर होना पड़ेगा।
साफ-साफ कहें तो, अब पुरानी टेक्नोलॉजी वाले कारखानों के लिए खेल मुश्किल हो जाएगा। उन्हें अपनी हीट रिकवरी सिस्टम (heat recovery systems) को अपग्रेड करना होगा ताकि ऊर्जा की बर्बादी कम हो।
यह सिर्फ चीन के भीतर की बात नहीं है, इन बदलावों का असर ग्लोबल मार्केट पर भी दिखाई देगा।
सस्ते सोलर पैनल के दौर का क्या होगा?
यह एक बड़ा सवाल है। इन नए नियमों का मकसद ही है कि सोलर बाजार में सिर्फ सस्ते दाम पर होने वाली प्रतिस्पर्धा को खत्म किया जाए।
अब कंपनियों को अच्छी क्वालिटी और ज्यादा एफिशिएंट प्रोडक्ट बनाने पर जोर देना होगा। इससे उन कंपनियों को फायदा होगा जो रिसर्च और डेवलपमेंट में निवेश करती हैं और नई-नई तकनीकें लाती हैं।
कुल मिलाकर, चीन यह संदेश दे रहा है कि वह अपने सोलर उद्योग को और ज्यादा मजबूत, सस्टेनेबल और तकनीकी रूप से उन्नत बनाना चाहता है। अब उनका फोकस सिर्फ 'कितना बना' पर नहीं, बल्कि 'कितना अच्छा बना' पर होगा।
इसका सीधा असर दुनिया भर में सोलर पैनल की कीमतों और उपलब्धता पर पड़ सकता है, क्योंकि चीन अभी भी ग्लोबल सोलर सप्लाई चेन का एक बड़ा हिस्सा है। अब देखते हैं 1 जनवरी 2027 के बाद सोलर बाजार की सूरत कैसी दिखती है।




































