भुवनेश्वर: केंद्र सरकार के लाखों कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए एक बड़ी खबर है, जिस पर सबकी निगाहें टिक गई हैं। ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में पिछले दिनों (6-7 जुलाई) चली दो दिवसीय क्षेत्रीय बैठकों के बाद, अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि सरकारी बाबुओं की अगली सैलरी कितनी बढ़ने वाली है और किस फॉर्मूले से ये तय होगा? इन बैठकों में जो सबसे बड़ा पेच फंसा है, वो है 'फिटमेंट फैक्टर' का, जिसे लेकर कर्मचारी यूनियनें और सरकार, दोनों अपनी-अपनी रणनीति बनाने में लगे हैं। मानो कोई रहस्यमयी 'जादुई नंबर' हो, जो तय करेगा कि अगले दस सालों तक सरकारी कर्मचारियों की जेब कितनी गर्म रहेगी। ये नंबर जितना बड़ा होगा, उतनी ही खुशी होगी और अगर ये नंबर छोटा रह गया, तो कर्मचारियों की उम्मीदों पर पानी फिर सकता है। तो आइए, जरा गहराई से समझते हैं कि आखिर ये फिटमेंट फैक्टर बला क्या है और क्यों एक्सपर्ट्स कह रहे हैं कि सिर्फ भत्तों के भरोसे रहने से काम नहीं चलेगा।
सोचिए, आप एक सैलरी स्लिप देखते हैं और आपकी बेसिक सैलरी तय होती है। इसी बेसिक सैलरी पर आपके बाकी भत्ते (जैसे महंगाई भत्ता, मकान किराया भत्ता वगैरह) भी निर्भर करते हैं।
अब ये फिटमेंट फैक्टर ही वो कड़ी है, जो आपकी पुरानी बेसिक सैलरी को नई बेसिक सैलरी में बदलती है। ये एक तरह का मल्टीप्लायर है, जिससे आपकी मौजूदा बेसिक सैलरी को गुणा करके 8वें वेतन आयोग के तहत मिलने वाली नई न्यूनतम बेसिक सैलरी तय की जाती है।
फिटमेंट फैक्टर: वो 'मल्टीप्लायर' जो सब तय करता है
इस 'फिटमेंट फैक्टर' को आसान शब्दों में समझा जाए, तो ये एक सैलरी मल्टीप्लायर है। जब कोई नया वेतन आयोग लागू होता है, तो कर्मचारियों की पुरानी बेसिक सैलरी को इस फिटमेंट फैक्टर से गुणा किया जाता है।
जो संख्या निकलकर आती है, वही उस वेतन आयोग के तहत न्यूनतम बेसिक सैलरी बन जाती है।
- 7वें वेतन आयोग का उदाहरण: अगर आपको याद हो, तो पिछले यानी 7वें वेतन आयोग में सरकार ने 2.57 का फिटमेंट फैक्टर लागू किया था। इसका नतीजा ये हुआ कि कर्मचारियों की न्यूनतम बेसिक सैलरी जो पहले 7,000 रुपये थी, वो सीधे बढ़कर 18,000 रुपये हो गई। सोचिए, एक झटके में सैलरी का बेस कितना बदल गया!
- 8वें वेतन आयोग की चुनौती: अब 8वें वेतन आयोग का गठन हुए आठ महीने से ज्यादा का वक्त बीत चुका है। लेकिन सरकार ने अभी तक ये नहीं बताया है कि इस बार ये 'जादुई नंबर' क्या होगा। निचले स्तर के कर्मचारियों की मांग है कि इस मल्टीप्लायर को इस बार और भी बड़ा रखा जाए। उनका तर्क सीधा है: बढ़ती महंगाई और लगातार बढ़ते खर्चों के इस दौर में, अगर उन्हें अच्छी सैलरी हाइक नहीं मिली, तो घर चलाना मुश्किल हो जाएगा।
एक्सपर्ट्स के गणित में क्या चल रहा है?
अब सवाल ये उठता है कि 8वें वेतन आयोग में ये फिटमेंट फैक्टर कितना हो सकता है? इसे लेकर देश के बड़े फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स के बीच अलग-अलग गणित चल रहे हैं। ये गणित दो ध्रुवों पर बंटे हुए दिख रहे हैं:
एक तरफ, बैंकबाजार (Bankbazaar) के एक्सपर्ट का अनुमान है कि इस बार फिटमेंट फैक्टर 2.28 से लेकर 2.86 के बीच रह सकता है। उनका मानना है कि सरकार को महंगाई और कर्मचारियों की उम्मीदों के बीच संतुलन साधना होगा।
अगर महंगाई ज्यादा है, तो फिटमेंट फैक्टर को ऊपर रखना होगा, ताकि कर्मचारियों की परचेजिंग पावर बनी रहे। यह एक ऐसा फैसला होगा, जो सीधे तौर पर लाखों परिवारों की आर्थिक स्थिति पर असर डालेगा।
वहीं, दूसरी ओर कुछ एक्सपर्ट्स थोड़े ज्यादा सतर्क दिख रहे हैं। उनका कहना है कि देश की मौजूदा वित्तीय स्थिति और बजटीय सीमाओं को देखते हुए, सरकार इस फिटमेंट फैक्टर को 1.90 से 2.10 के दायरे में सीमित रख सकती है।
उनके अनुसार, देश पर जो वित्तीय दबाव है, उसे देखते हुए इस नंबर का 2.3 से ऊपर जाना थोड़ा मुश्किल लग रहा है। यह एक ऐसा पहलू है जिस पर सरकार को कर्मचारियों की मांग और अपने वित्तीय बोझ के बीच तालमेल बिठाना होगा।
सिर्फ भत्ते बढ़ाने से क्यों नहीं बनेगी बात?
अक्सर लोग सोचते हैं कि अगर सरकार फिटमेंट फैक्टर थोड़ा कम भी रखती है, लेकिन महंगाई भत्ता (DA) या मकान किराया भत्ता (HRA) जैसे अन्य भत्तों को बढ़ा देती है, तो भी कर्मचारियों को फायदा हो जाएगा। लेकिन एक्सपर्ट्स साफ कहते हैं कि ये पूरी तस्वीर नहीं है।
दरअसल, सरकारी कर्मचारियों की सैलरी का पूरा ढांचा बेसिक सैलरी पर टिका होता है। आपके डीए, एचआरए, ट्रैवल अलाउंस (TA) और कई दूसरे भत्ते आपकी बेसिक सैलरी के प्रतिशत के रूप में तय होते हैं।
इसका मतलब ये है कि अगर बेसिक सैलरी का आधार ही छोटा रहा, तो उस पर लगने वाले प्रतिशत से भी भत्तों की रकम बहुत ज्यादा नहीं बढ़ेगी।
उदाहरण के लिए, अगर आपकी बेसिक सैलरी 18,000 रुपये है और डीए 50% है, तो आपको 9,000 रुपये डीए मिलेगा। लेकिन अगर फिटमेंट फैक्टर अच्छा होता और आपकी बेसिक सैलरी बढ़कर 25,000 रुपये हो जाती, तो उसी 50% डीए पर आपको 12,500 रुपये मिलते।
यानी, बेसिक सैलरी जितनी ज्यादा होगी, उतने ही ज्यादा आपके भत्ते भी होंगे, भले ही उनका प्रतिशत वही रहे। यही वजह है कि कर्मचारी यूनियनें फिटमेंट फैक्टर को 'किंग' मानती हैं, क्योंकि ये ही लंबी अवधि में उनकी सैलरी ग्रोथ का असली आधार तय करता है।
सिर्फ भत्तों के भरोसे रहने से वो स्थायी और महत्वपूर्ण लाभ नहीं मिल पाएगा, जिसकी कर्मचारियों को उम्मीद है। अब देखना होगा कि सरकार और यूनियनें इस 'जादुई नंबर' पर किस नतीजे पर पहुंचती हैं।








































