दिल्ली: भैया, आजकल एक चीज से तो आप भाग ही नहीं सकते, और वो है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, जिसे हम प्यार से AI कहते हैं। सुबह उठो तो फोन में AI, ऑफिस में काम करो तो AI की मदद, यहां तक कि एंटरटेनमेंट और आर्ट में भी AI का जलवा है। ऐसा लग रहा था कि AI ने पूरी दुनिया को अपने कब्जे में ले लिया है, हर कोई इसी की धुन पर नाच रहा है। लेकिन जरा ठहरिए! एक नई रिपोर्ट सामने आई है, जिसने इस AI के 'हवा-हवाई' होने पर सवालिया निशान लगा दिया है।
हमें लग रहा था कि AI का इस्तेमाल दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा है, लेकिन हकीकत कुछ और ही निकली। टेक वेबसाइट टेकराडार की पैरेंट कंपनी फ्यूचर (Future) ने एक सर्वे किया है, जिसके नतीजे चौंकाने वाले हैं।
पता चला है कि पिछले एक साल में जेमिनी और चैटजीपीटी जैसे चैटबॉट्स का रोजाना भारी इस्तेमाल 31 फीसदी तक घट गया है। जी हां, आपने ठीक सुना, 31 परसेंट!
अब ये सुनकर दिमाग में सवाल आता है कि आखिर ऐसा हुआ क्यों? जिस AI को हर समस्या का समाधान माना जा रहा था, लोग उससे क्यों मुंह मोड़ने लगे हैं? सर्वे में इसकी कुछ दिलचस्प वजहें सामने आई हैं, जो हमें AI के भविष्य के बारे में सोचने पर मजबूर करती हैं।
AI से क्यों ऊब रहे हैं लोग, क्या है इसकी वजह?
इस सर्वे को 1,008 लोगों पर किया गया था, और जब इनके जवाबों को पिछले साल के सर्वे से मिलाया गया, तो एक पैटर्न साफ दिखा। सबसे बड़ी वजह जो निकलकर आई, वो है प्राइवेसी की चिंता।
सर्वे में 32 फीसदी लोगों ने कहा कि उन्हें AI के इस्तेमाल से अपनी प्राइवेसी का डर लगता है। उन्हें लगता है कि उनका डेटा कहां जा रहा है, कैसे इस्तेमाल हो रहा है, इसकी कोई गारंटी नहीं है।
कमाल की बात ये है कि पिछले साल भी यही आंकड़ा था, यानी AI चाहे जो भी वादे करे, लोगों के मन से प्राइवेसी का डर कम नहीं हुआ है।
दूसरे नंबर पर जो वजह है, वो इंसानियत को थोड़ी तसल्ली दे सकती है। सर्वे में 31 फीसदी लोगों ने बताया कि उन्हें इंसानों से बातचीत करना ज्यादा पसंद है।
भले ही AI अब लगभग हर विषय पर घंटों बातचीत कर सकता है, लेकिन ऐसा लगता है कि हम इंसान अभी भी खून-मांस के रिश्तों और असली बातचीत को ज्यादा तरजीह देते हैं। AI कितना भी स्मार्ट क्यों न हो जाए, एक दोस्त की बात या परिवार के साथ हंसी-मजाक की जगह नहीं ले सकता, है कि नहीं?
तीसरी वजह भी काफी मायने रखती है। 29 फीसदी लोग ऐसे थे जिन्होंने कहा कि वे AI के बिना भी खुश हैं।
पिछले सर्वे की तुलना में ये आंकड़ा 18 फीसदी कम है। इसका मतलब ये हो सकता है कि अब ऐसे लोगों की संख्या घट गई है जो AI को सिरे से नकारते हैं।
शायद एक बड़े तबके ने मान लिया है कि AI अब उनकी जिंदगी का हिस्सा बन चुका है, और वे इसके साथ एडजस्ट कर रहे हैं, या फिर उन्हें AI के साथ रोजमर्रा की बातचीत में कोई दिक्कत नहीं है। कुल मिलाकर, जो लोग पहले AI को बिलकुल नहीं चाहते थे, उनमें से कुछ अब शायद इसे अपना रहे हैं, या कम से कम इसके प्रति उनका विरोध कम हुआ है।
सिर्फ यूसेज नहीं, AI को लेकर 'एंटी-भावना' भी बढ़ रही है, ऐसा क्यों?
बात सिर्फ AI के रोजाना इस्तेमाल में कमी की नहीं है, बल्कि AI को लेकर एक तरह की 'एंटी-भावना' भी पनप रही है। लोग AI के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, जैसे कि डेटा सेंटर्स के विस्तार को लेकर होने वाले धरने।
इसके अलावा, AI से बनने वाले 'स्लॉप कंटेंट' (Slop Content) को लेकर भी लोगों में नाराजगी है। स्लॉप कंटेंट मतलब वो बेकार और घटिया सामग्री जो AI बिना किसी समझ या क्वालिटी के धड़ाधड़ जनरेट कर देता है।
ये ऐसा है जैसे कोई बिना सोचे-समझे कचरा फैला रहा हो और आप कहो कि ये तो नया आर्ट है!
इस पूरे मामले पर कुछ और स्टडीज भी सामने आई हैं, जो मौजूदा ट्रेंड को और साफ करती हैं। एक स्टडी कहती है कि जो ब्रांड्स 'इंसानों जैसी' आवाज में बात करते हैं, यानी जिनमें मानवीय भावनाएं और कनेक्शन झलकता है, वे AI के इस दौर में आगे रहेंगे।
वहीं, एक और स्टडी ने पाया कि लोग अब AI की तरह आवाज करने से डरने लगे हैं। उन्हें लगता है कि अगर वे भी AI जैसे ही बोलने लगेंगे, तो उनकी अपनी पहचान कहीं खो न जाए।
मजेदार बात ये भी है कि लगभग आधे लोग तो ये चाहते हैं कि बस एक चुटकी बजाएं और जनरेटिव AI गायब हो जाए!
ये सारी बातें मिलकर एक बड़ी तस्वीर बनाती हैं। AI भले ही हमारी जिंदगी में गहरे तक पैठ बना चुका है, लेकिन इंसान के तौर पर हमारी कुछ बुनियादी जरूरतें हैं, जैसे कि प्राइवेसी, मानवीय संपर्क और अपनी मौलिकता।
AI का जादू शुरुआत में भले ही सबको दीवाना बना दे, लेकिन जब बात रोजमर्रा के इस्तेमाल और गहरे भरोसे की आती है, तो लोग अभी भी थोड़ा हिचक रहे हैं। अब देखना ये है कि AI बनाने वाली कंपनियां इन चिंताओं को कैसे दूर करती हैं और कैसे AI को और भरोसेमंद बनाती हैं, ताकि उसका इस्तेमाल सिर्फ 'चमत्कार' न लगे, बल्कि एक 'सहयोगी' के तौर पर हो सके।





































