गाजियाबाद: जब बात भारत में देसी ब्रांड्स की आती है, तो कुछ नाम ऐसे हैं, जो सिर्फ बोतल नहीं, बल्कि एक फीलिंग बन जाते हैं। इनमें से एक नाम है 'ओल्ड मंक'। आपने सर्दी की शामों में, दोस्तों की महफिल में, या घर की किसी पुरानी पार्टी में इसे ज़रूर देखा होगा। हो सकता है, पिया भी हो! लेकिन इस 'काला सोना' जैसी रम की कहानी में एक ऐसा ट्विस्ट है, जिसे सुनकर आप अपनी चाय की चुस्की या पानी का गिलास वहीं का वहीं रख देंगे। सोचिए, एक ऐसी शराब, जिसने विज्ञापन पर एक पैसा खर्च नहीं किया, जिसकी ब्रांडिंग के लिए कोई सेलिब्रिटी नहीं दौड़ा, फिर भी वो भारत में एक लीजेंड बन गई। अब इसमें सबसे मज़ेदार बात ये है कि जिस शख्स ने इस ब्रांड को बुलंदियों पर पहुंचाया, उसने खुद कभी शराब को हाथ तक नहीं लगाया। जी हाँ, बिल्कुल सही पढ़ा आपने!
हम बात कर रहे हैं मोहन मीकिन के पूर्व चेयरमैन कपिल मोहन की। वो एक रिटायर्ड आर्मी अफसर थे, पक्के चाय के शौकीन, जिन्होंने अपनी ज़िंदगी में शराब को छुआ तक नहीं।
लेकिन उन्हीं की लीडरशिप में 'ओल्ड मंक' ने वो मुकाम हासिल किया, जो बड़े-बड़े मार्केटिंग गुरु भी सिर्फ सपने में देखते हैं। आज 'वर्ल्ड रम डे' है, और ऐसे में इस असाधारण कहानी को याद करना तो बनता ही है।
आखिर कैसे एक नॉन-ड्रिंकर ने शराब के कारोबार में ऐसा झंडा गाड़ा कि पूरी दुनिया दंग रह गई?
क्या है 'ओल्ड मंक' की पहचान का राज?
भारत में शायद ही कोई और ऐसी बोतल होगी, जो 'ओल्ड मंक' जैसी वफ़ादारी और एक अलग तरह का लगाव पैदा करती हो। पीने की आदतें बदलीं, विदेशी ब्रांड्स के रंग-बिरंगे लेबल बाजार में आए, कई नई पीढ़ियाँ आईं, लेकिन 'ओल्ड मंक' ने अपनी जगह पक्की बनाए रखी।
बिना किसी तामझाम, बिना किसी चमकदार विज्ञापन कैंपेन के, इसने ये सब कैसे कर दिखाया? आप किसी भी बार में चले जाइए, किसी फौजी कैंटीन में घुस जाइए, या अपनी पड़ोस की शराब की दुकान में झांक लीजिए — आपको वो जानी-पहचानी, थोड़ी छोटी और चौड़ी बोतल, शेल्फ पर मुस्कुराती हुई दिख ही जाएगी।
इसकी सबसे बड़ी खासियत हमेशा से इसकी एक जैसी, बेजोड़ क्वालिटी रही है। 1950 के दशक में जब ये रम पहली बार बाजार में आई थी, तब से लेकर आज तक इसका खास डार्क रम का स्वाद और मिज़ाज लगभग वैसा ही है।
इसमें कैरमल का एक बढ़िया वाला टेस्ट होता है, वनीला और चॉकलेट की हल्की-सी ख़ुशबू मिलती है, और इसका बेहतरीन स्मूद फिनिश इसे लाखों लोगों की पहली पसंद बनाता है। जहां दूसरे ब्रांड्स समय के साथ अपने आप को बदलते रहते हैं, नए-नए फ्लेवर और पैकेजिंग लाते हैं, वहीं 'ओल्ड मंक' ने चुपचाप अपने पुराने अंदाज़ को पकड़े रखा।
शायद यही इसकी सबसे बड़ी तरक़्की और 'इनोवेशन' था। इसने दिखाया कि कभी-कभी सबसे अच्छा बदलाव, कोई बदलाव न करना ही होता है!
कौन थे 'ओल्ड मंक' के पीछे के असली मास्टरमाइंड?
इस कहानी का सबसे हैरान कर देने वाला पहलू, जैसा कि हमने पहले भी बताया, वो शख्स है जिसने इसे दुनिया भर में पहचान दिलाई। मोहन मीकिन के पूर्व चेयरमैन, कपिल मोहन।
ये वो शख़्सियत थे जिन्होंने कभी शराब को छुआ तक नहीं, लेकिन उनके फैसलों ने 'ओल्ड मंक' को अमर कर दिया। कपिल मोहन सेना से रिटायर्ड थे और चाय के बहुत बड़े शौकीन थे।
उन्होंने ये फैमिली बिज़नेस अपने बड़े भाई वेद रतन मोहन के निधन के बाद संभाला। ये वेद रतन मोहन ही थे, जिन्होंने इस शानदार रम को बनाया था।
1970 के दशक की शुरुआत से, कपिल मोहन की दमदार लीडरशिप में 'ओल्ड मंक' ने आसमान छूना शुरू कर दिया। जो पहले सिर्फ एक लोकप्रिय भारतीय शराब थी, वो साल 2000 आते-आते दुनिया की सबसे ज्यादा बिकने वाली डार्क रम बन गई।
सोचिए, एक ऐसा प्रोडक्ट, जिसका मालिक खुद उसे कभी टेस्ट नहीं करता, उसे दुनिया का नंबर वन कैसे बना सकता है? ये सिर्फ़ एक बिजनेस स्टोरी नहीं है, ये एक लगन, दूरदर्शिता और शायद एक अलग तरह के विश्वास की कहानी है।
'ओल्ड मंक' नाम के पीछे का क्या है रहस्य?
'ओल्ड मंक' से जुड़ा ये रहस्य इसकी लोकप्रियता में और चार-चांद लगा देता है। किसी को भी ठीक-ठीक नहीं पता कि इसका नाम आखिर कैसे पड़ा।
कुछ लोग मानते हैं कि ये नाम मठों में पारंपरिक तौर पर रखे जाने वाले लकड़ी के पीपों (बैरल) की वजह से पड़ा, जिनमें शराब को पुराना किया जाता था। वहीं कुछ और लोग कहते हैं कि इसका परिपक्व और थोड़ा कड़वा, लेकिन स्ट्रॉंग स्वाद, इसे बनाने वालों को एक बूढ़े साधु (मॉन्क) की समझदारी और अनुभव की याद दिलाता था।
सच जो भी हो, ये रहस्य कहीं न कहीं इस ब्रांड को और भी ज़्यादा दिलचस्प बना देता है।
यहां तक कि इसकी खास बोतल भी, जिस पर एक बूढ़े साधु का चेहरा बना होता है, दशकों से लगभग वैसी ही रही है। ये बोतल भारत की कई पीढ़ियों के लिए तुरंत पहचान में आ जाती है और इसे अक्सर लोग सर्दियों की खुशनुमा शामों, पुरानी दोस्ती की कहानियों और पारिवारिक समारोहों से जोड़कर देखते हैं।
यह सिर्फ एक ड्रिंक नहीं, बल्कि यादों का एक हिस्सा है।
इस ब्रांड के बढ़ने का तरीका भी वाकई बहुत अनोखा था। 'ओल्ड मंक' ने कभी विज्ञापन का सहारा नहीं लिया, और ये कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं था।
असल में, कपिल मोहन ने जान-बूझकर ऐसा फ़ैसला लिया था। उनका मानना था कि उनके प्रोडक्ट की क्वालिटी ही उसका सबसे बड़ा विज्ञापन है।
और उन्होंने ये बात सच भी साबित कर दिखाई। 'ओल्ड मंक' की कहानी हमें सिखाती है कि सच्ची क्वालिटी और एक बेजोड़ विरासत बनाने के लिए हमेशा शोर-शराबे या चकाचौंध की ज़रूरत नहीं होती।
कभी-कभी चुपचाप अपना काम करते जाना ही सबसे बड़ा खेल पलट देता है।




































