मंगलुरु: मिडिल ईस्ट में एक बार फिर टेंशन हाई है और समुद्री रास्तों पर कभी भी कोई बड़ा ब्लॉकबेड हो सकता है। ऐसे में हर देश अपनी एनर्जी सिक्योरिटी को मजबूत करने में लगा है, और भारत ने भी इसी दिशा में एक बेहद अहम कदम उठाया है। देश की सबसे बड़ी तेल और गैस खोजकर्ता कंपनी, ओएनजीसी (ONGC) ने एक ऐसा प्लान बनाया है जो संकट के समय भी देश की रफ्तार को थमने नहीं देगा। ओएनजीसी दक्षिण भारत के मंगलुरु में 17.5 लाख टन क्षमता का एक नया 'नेशनल स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व' (SPR) बनाने जा रही है, जिसे आप रणनीतिक कच्चा तेल भंडार कह सकते हैं।
सोचिए, अगर किसी अंतरराष्ट्रीय संकट की वजह से विदेशों से तेल आना बंद हो जाए, तो हमारे देश का क्या होगा? पेट्रोल पंप खाली हो जाएंगे, फैक्ट्रियां बंद हो जाएंगी और रोजमर्रा की जिंदगी पर ब्रेक लग जाएगा। ऐसे ही मुश्किल वक्त से निपटने के लिए इन 'स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व' में कच्चा तेल जमा किया जाता है।
यह एक तरह का 'इमरजेंसी बैकअप' है, जो देश को ऐसे बड़े झटकों से बचाने का काम करता है।
ओएनजीसी ने शेयर बाजारों को दी गई अपनी रेगुलेटरी फाइलिंग में इस बड़ी योजना की जानकारी दी है। यह सिर्फ एक स्टोरेज फैसिलिटी नहीं है, बल्कि देश की ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में एक बहुत बड़ा फैसला है।
इससे भारत की आत्मनिर्भरता और भी मजबूत होगी।
आखिर भारत को इतने बड़े तेल भंडार की जरूरत क्यों पड़ रही है?
आपको बता दें कि भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक और उपभोक्ता देश है। हमारी कुल तेल जरूरतों का करीब 85% हिस्सा हम विदेशों से खरीदते हैं।
यानी हमारी अर्थव्यवस्था काफी हद तक दूसरे देशों से आने वाले कच्चे तेल पर निर्भर करती है। यही वजह है कि जब भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की सप्लाई में कोई रुकावट आती है, तो भारत पर इसका सीधा असर पड़ता है।
पिछले दिनों के कुछ वाकये ऐसे हैं, जिन्होंने भारत को यह सोचने पर मजबूर किया है। हाल ही में ईरान पर इजरायल-अमेरिकी हमलों के बाद जब 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' के समुद्री रास्ते को ब्लॉक कर दिया गया था, तब भारत को कच्चे तेल की सप्लाई में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा था।
'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' दुनिया की कुल ऊर्जा सप्लाई का लगभग पांचवां हिस्सा संभालता है। अगर यह रास्ता बाधित हो जाए, तो पूरी दुनिया के साथ-साथ भारत में भी तेल का संकट गहरा सकता है।
ऐसे में, अपने पास पर्याप्त मात्रा में कच्चा तेल जमा रखना एक बुद्धिमानी भरा कदम है।
क्या यह सिर्फ इमरजेंसी के लिए है या इसका कोई और इस्तेमाल भी होगा?
ओएनजीसी ने अपनी फाइलिंग में एक और दिलचस्प बात बताई है। कंपनी ने साफ किया है कि यह विशालकाय स्टोरेज 'राष्ट्रहित' में बनाया जा रहा है, लेकिन वह इसके एक हिस्से को व्यावसायिक यानी कमर्शियल इस्तेमाल के लिए उपयोग करने की खातिर केंद्र सरकार से अनुमति मांगेगी।
यह एक स्मार्ट मूव है क्योंकि इससे भंडारण लागत का कुछ हिस्सा रिकवर किया जा सकता है और जरूरत पड़ने पर बाजार को भी तेल सप्लाई किया जा सकता है।
फिलहाल, केंद्र सरकार पहले से ही दक्षिण भारत के तीन अहम स्थानों - मंगलुरु, पादुर और विशाखापट्टनम - में बने रणनीतिक भंडारों के एक हिस्से को व्यावसायिक उपयोग के लिए मंजूरी देती है। इन तीनों जगहों पर कुल मिलाकर 5.33 मिलियन मीट्रिक टन कच्चा तेल स्टोर करने की क्षमता है।
इन भंडारों का प्रबंधन सरकारी कंपनी 'इंडियन स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व्स लिमिटेड' (ISPRL) करती है। नया ओएनजीसी भंडार इस मौजूदा क्षमता को और भी बढ़ा देगा, जिससे भारत की तेल सुरक्षा और मजबूत होगी।
क्या दूसरे देशों के साथ भी भारत की कोई साझेदारी है?
जी हां, भारत अपनी एमर्जेंसी स्टॉक को मजबूत करने के लिए सिर्फ घरेलू स्तर पर ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी दोस्त देशों के साथ मिलकर काम कर रहा है। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और जापान जैसे मित्र देशों के साथ भारत लगातार अपनी एनर्जी पार्टनरशिप बढ़ा रहा है।
यह साझेदारी संकट के समय तेल की निर्बाध सप्लाई सुनिश्चित करने में मदद करती है।
बात मंगलुरु की करें, तो यहां ओएनजीसी की सहायक कंपनी 'मंगलुरु रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड' (MRPL) पहले से ही 3 लाख बैरल प्रतिदिन की क्षमता वाली एक बड़ी रिफाइनरी चलाती है। इस नई रणनीतिक भंडार के बनने से मंगलुरु, भारत की ऊर्जा सुरक्षा के मानचित्र पर एक और महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में उभरेगा।
कुल मिलाकर, यह कदम भारत को अंतरराष्ट्रीय झटकों से बचाने और उसकी विकास यात्रा को बिना किसी रुकावट के आगे बढ़ाने में एक अहम भूमिका निभाएगा।






































