नई दिल्ली: कल्पना कीजिए कि आप एक दिन भारत में हैं, अगले दिन दुबई में और फिर फ्रांस पहुंच जाते हैं। तीनों ही जगहों पर थर्मामीटर 40 डिग्री सेल्सियस दिखा रहा है। अब कायदे से तो गर्मी एक जैसी होनी चाहिए, है ना? लेकिन असलियत इससे बिल्कुल उलट है। आपको तीनों जगहों पर गर्मी का अहसास अलग-अलग होगा। कोई जगह आपको झुलसा देगी, तो कहीं आप बस हल्का सा पसीना महसूस करेंगे।
अब आप सोच रहे होंगे कि भाई, जब पारा 40 डिग्री ही है, तो फिर यह खेल क्या है? दरअसल, यह सारा मामला सिर्फ टेम्परेचर का नहीं है, बल्कि इसके पीछे ह्यूमिडिटी, हवा की रफ्तार और वहां के इंफ्रास्ट्रक्चर का पूरा सिस्टम काम करता है। मोटा-मोटी बात यह है कि आपका शरीर तापमान को नहीं, बल्कि उस माहौल को महसूस करता है जिसमें आप खड़े हैं।
फ्रांस में 40 डिग्री इतना खतरनाक क्यों लगता है?
फ्रांस की बात करें तो वहां का मामला थोड़ा पेचीदा है। गर्मियों में वहां दिन बहुत लंबे होते हैं, करीब 15 से 17 घंटे तक धूप खिली रहती है।
अब जब धूप इतनी देर तक रहेगी, तो सड़कें, फुटपाथ और बड़ी-बड़ी इमारतें गर्मी को सोख लेती हैं। नतीजा यह होता है कि रात होने के बाद भी ये दीवारें और सड़कें गर्मी छोड़ती रहती हैं, जिससे माहौल तपता रहता है।
एक और बड़ा चैलेंज वहां के घरों का डिजाइन है। फ्रांस के पुराने घर ठंड से बचने के लिए बनाए गए थे।
उनकी दीवारें मोटी होती हैं और खिड़कियां छोटी, ताकि अंदर की गर्मी बनी रहे। लेकिन जब हीटवेव आती है, तो यही डिजाइन मुसीबत बन जाता है क्योंकि अंदर की गर्मी बाहर नहीं निकल पाती।
ऊपर से वहां हर घर में एसी या सीलिंग फैन का कल्चर वैसा नहीं है जैसा हमारे यहां है, इसलिए वहां के लोगों के लिए 40 डिग्री झेलना एक बड़ा टास्क बन जाता है।
दुबई की तपिश और एसी का जादू?
अब बात करते हैं दुबई की। दुबई एक रेगिस्तानी इलाका है, तो वहां की धूप बहुत ही तेज और तीखी होती है।
वहां चलने वाली गर्म हवाएं सीधे शरीर पर वार करती हैं। लेकिन यहां एक ट्विस्ट है।
दुबई का इंफ्रास्ट्रक्चर ऐसा है कि आपको बाहर की तपिश ज्यादा देर तक महसूस ही नहीं होने दी जाती।
वहां के मॉल, बस स्टॉप, मेट्रो और कारों में एयर कंडीशनिंग का ऐसा जबरदस्त सिस्टम है कि आप एक एसी वाले कमरे से निकलकर दूसरे एसी वाले जोन में पहुंच जाते हैं। बाहर भले ही पारा 40 या उससे ऊपर हो, लेकिन मॉडर्न कूलिंग सिस्टम की वजह से वहां के लोग इस गर्मी को मैनेज कर लेते हैं।
भारत में हम इतनी गर्मी कैसे झेल लेते हैं?
अब आते हैं अपने भारत पर। हमारे यहां तो 40 डिग्री सेल्सियस का तापमान एक आम बात है।
भारत के कई राज्यों में यह पारा अक्सर पार हो जाता है। अब सवाल यह है कि हम इसे इतनी आसानी से कैसे झेल लेते हैं? इसका सीधा जवाब है—एडेप्टेशन।
लंबे समय से ऐसी गर्मी झेलने की वजह से हमारा शरीर इस मौसम का आदी हो चुका है। इसके अलावा, हमारे यहां के घरों का डिजाइन भी काफी हद तक गर्मी को ध्यान में रखकर बनाया गया है।
ऊंची छतें, बड़े बरामदे और क्रॉस वेंटिलेशन जैसी चीजें घर के अंदर हवा का बहाव बनाए रखती हैं, जिससे तपिश का असर थोड़ा कम हो जाता है।
आखिर गर्मी का अहसास बदलता क्यों है?
कुल मिलाकर बात यह है कि सिर्फ थर्मामीटर की रीडिंग यह तय नहीं करती कि आपको कितनी गर्मी लगेगी। हवा में नमी (ह्यूमिडिटी) कितनी है, हवा की रफ्तार क्या है और आपके आसपास की इमारतें कैसी हैं, यह सब मिलकर तय करते हैं कि 40 डिग्री का अनुभव कैसा होगा।
फ्रांस में लंबे दिन और सीमित कूलिंग व्यवस्था हीटवेव को मुश्किल बना देती है, दुबई में तेज धूप है लेकिन एसी का सहारा है, और भारत में हमारा शरीर और घर की बनावट हमें इस तपिश से लड़ने की ताकत देती है। यही वजह है कि एक ही टेम्परेचर अलग-अलग देशों में अलग-अलग एक्सपीरियंस देता है।






































