पठानकोट: पंजाब का पठानकोट जिला, जहां गर्मी इस कदर सितम ढा रही है कि लोग परेशान हैं। लेकिन इस परेशानी को डबल करने का काम कर रही है बिजली कटौती। हालात इतने बिगड़ गए कि यहां के करीब 10-12 गांवों के लोगों का सब्र जवाब दे गया। रात का अंधेरा, घड़ी में बज रहे थे दो, लेकिन नींद किसी की आंखों में नहीं थी। लोग घरों से निकले और सीधा पहुंच गए हल्का भोआ में बने मंगवाल बिजली स्टेशन के बाहर। हाथों में तख्तियां नहीं थी, बस गुस्से और निराशा से भरे चेहरे थे, और जुबान पर थे बिजली विभाग और उसके अधिकारियों के खिलाफ नारे। ये कोई अचानक हुआ प्रदर्शन नहीं था, बल्कि कई सालों से चले आ रहे बिजली संकट का उबलता हुआ लावा था, जो अब सड़क पर आ चुका था।
ग्रामीणों का सीधा-सीधा आरोप है कि 24 घंटे में सिर्फ 2 घंटे बिजली मिलती है। सोचिए, इस भीषण गर्मी और उमस में जब बाहर निकलना मुश्किल होता है, तब घरों में बिना पंखे, कूलर और एसी के कैसे रहा जाए? गांव वालों का कहना है कि सरकारें बदलती रहती हैं, मंत्री और अफसर बदलते हैं, लेकिन उनके इलाके की किस्मत नहीं बदलती।
बिजली का संकट जैसा का तैसा बना हुआ है। अब ये गांव वाले करें भी तो क्या करें? जब फोन मिलाओ तो जूनियर इंजीनियर (JE) और सब-डिवीजनल ऑफिसर (SDO) साहब फोन नहीं उठाते।
शिकायत कहां करें? अपनी बात किसको सुनाएं?
अफसरों की 'फोन नॉट रीचेबल' पॉलिसी
प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे शेखुपुर मंजीरी के सरपंच साहब ने मीडिया को बताया कि ये समस्या आज की नहीं, कई सालों से चली आ रही है। ग्रामीणों ने खुलकर अपनी भड़ास निकाली।
उन्होंने बताया कि जब भी बिजली जाती है, और ये जाती तो सुबह से लेकर रात तक है, तब शिकायत करने के लिए बिजली विभाग के अधिकारियों को फोन मिलाया जाता है। लेकिन JE और SDO साहब के फोन "नॉट रीचेबल" ही रहते हैं या फिर उठाए ही नहीं जाते।
एक ग्रामीण ने तो यहां तक कहा कि "हमें मजबूरन रात में इतनी बड़ी संख्या में बिजली घर आना पड़ा।" कहने का मतलब साफ है, जब कोई और रास्ता नहीं बचा, तब जनता ने अपने हक के लिए रात के अंधेरे में मोर्चा खोल दिया।
ये सिर्फ बिजली का मुद्दा नहीं, ये सिस्टम के प्रति लोगों का अविश्वास और निराशा है।
आंधी कहीं चले, अंधेरा हमारे गांव में
ग्रामीणों की एक और बड़ी शिकायत थी, जो सुनने में काफी अजीब है, लेकिन हकीकत है। उनका कहना है कि पठानकोट शहर या आसपास के दूसरे इलाकों में अगर मामूली सी आंधी या हल्की-फुल्की बारिश भी आ जाए, तो उनके 7-8 गांवों की बिजली तुरंत काट दी जाती है।
आप सोचिए, गलती किसी और की, सज़ा किसी और को। ऐसा क्यों होता है? इसका जवाब किसी के पास नहीं।
जिन गांवों का नाम खासतौर पर लिया गया, उनमें ताश पिंड, माखनपुर, बरमाल जट्टा, अखाड़ा, मंजीरी आर्यां, जट्टां दी मंजीरी, राजपूतां दी मंजीरी और किल्लपुर शामिल थे। इन गांवों के लोगों का कहना है कि बिजली विभाग की इस कथित लापरवाही से उनका जीना मुहाल हो गया है।
बच्चों की पढ़ाई हो या घर का काम, सब कुछ अंधेरे में ठप पड़ जाता है।
क्रशरों को बिजली, हमें अंधेरा?
विरोध प्रदर्शन के दौरान माहौल तब और गरमा गया जब ग्रामीणों ने अपनी आवाज बुलंद की। उन्होंने एकजुट होकर बिजली विभाग, JE और SDO के खिलाफ "मुर्दाबाद" के नारे लगाए।
सरपंच और गांव के बाकी बड़े-बुजुर्गों ने बिजली विभाग को साफ चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि आज तो हम शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने और हाथ जोड़कर विनती करने आए हैं।
लेकिन अगर आगे भी इसी तरह बिना किसी वजह के इन गांवों की बिजली काटी गई, या फिर क्रशरों (पत्थर तोड़ने वाली इकाइयां) को प्राथमिकता देकर उनकी बिजली सप्लाई रोकी गई, तो आने वाले दिनों में ये प्रदर्शन और भी उग्र रूप ले सकता है। ये आरोप काफी गंभीर है, जो इशारा करता है कि औद्योगिक इकाइयों को ग्रामीण इलाकों की कीमत पर बिजली दी जा रही है।
रात के अंधेरे में पहुंची पुलिस, अधिकारी फिर भी 'गायब'
माहौल की गंभीरता को देखते हुए, देर रात सूचना मिलने पर पुलिस प्रशासन और सुरक्षाकर्मी भी मौके पर पहुंचे। उनका मकसद था कानून व्यवस्था बनाए रखना और किसी भी अप्रिय घटना को रोकना।
ग्रामीणों ने पुलिस के सामने भी अपनी बात रखी और साफ कहा कि उन्हें सिर्फ झूठे आश्वासन नहीं चाहिए। उन्हें बिजली की नियमित सप्लाई चाहिए, बस।
जब इस पूरे मामले पर बिजली विभाग के अधिकारियों से बात करने की कोशिश की गई, तो हमेशा की तरह उनके फोन नहीं उठे। यानी, जनता परेशान, रात के दो बजे सड़कों पर, और अधिकारी अपनी जिम्मेदारियों से भागते हुए नजर आए।
अब देखना ये है कि ग्रामीणों के इस उग्र प्रदर्शन के बाद बिजली विभाग कोई ठोस कदम उठाता है या फिर इन गांवों को अंधेरे में ही रहने दिया जाता है। कहानी यहीं खत्म नहीं होती, ये तो बस शुरुआत है लोगों के गुस्से की।


