पाकुड़: झारखंड का पाकुड़ जिला एक बार फिर अपने ऐतिहासिक हूल दिवस की धूम में सराबोर हो गया। जब सूरज की पहली किरणें सिद्धू-कान्हू मुर्मू पार्क पर पड़ीं, तो नज़ारा कुछ ऐसा था मानो ज़मीन पर इतिहास और वर्तमान एक साथ साँस ले रहे हों। पूरे शहर में एक अलग ही रौनक थी, हर तरफ उत्साह और श्रद्धा का माहौल। यह सिर्फ एक छुट्टी का दिन नहीं था, बल्कि उन वीर शहीदों को याद करने का पर्व था, जिन्होंने इस धरती की आज़ादी और सम्मान के लिए अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया था। लोग पारंपरिक वेशभूषा में ढोल-नगाड़ों के साथ इस खास दिन को मनाने के लिए उमड़ पड़े, और हवा में सिर्फ एक ही गूँज थी - अमर शहीदों की जय!
इस साल भी, हूल दिवस का मुख्य कार्यक्रम शहर के सिद्धू-कान्हू मुर्मू पार्क में बड़े ही भव्य तरीके से आयोजित किया गया। ज़रा सोचिए, सुबह से ही पार्क में भीड़ जुटना शुरू हो गई थी।
यहां लगे सिद्धू-कान्हू और चांद-भैरव की प्रतिमाओं पर एक-एक करके लोगों ने माल्यार्पण करना शुरू किया। फूल, मालाएं और श्रद्धा के बोल.
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सब कुछ मिलकर एक ऐसा दृश्य बना रहे थे जो हर किसी को भावुक कर रहा था। सिर्फ आम जनता ही नहीं, बल्कि प्रशासन के बड़े-बड़े अधिकारी भी इस मौके पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे थे।
पुलिस अधीक्षक अनुदीप सिंह और उप विकास आयुक्त अरविंद कुमार लाल ने भी शहीदों को श्रद्धासुमन अर्पित किए और उनके बलिदान को याद किया। उन्होंने कहा कि ये दिन हमें उन महानायकों की कुर्बानी की याद दिलाता है, जिन्होंने अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई और अपनी जान तक न्योछावर कर दी।
परंपरा और शौर्य का भव्य जुलूस
हूल दिवस का मतलब सिर्फ कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक पूरी सांस्कृतिक यात्रा है। शहर के अलग-अलग कोनों से आदिवासी संगठनों और राजनीतिक दलों ने मिलकर भव्य जुलूस निकाले।
इन जुलूसों में भाग लेने वाले लोगों की संख्या इतनी ज्यादा थी कि शहर की सड़कें जनसैलाब में बदल गईं। आप कल्पना कीजिए, हजारों की संख्या में लोग अपनी पारंपरिक वेशभूषा, यानी कि धोती, गंजी, साड़ी और रंग-बिरंगे परिधानों में सजे-धजे, अपने हाथों में तीर-धनुष लिए, नाचते-गाते हुए आगे बढ़ रहे थे।
इन जुलूसों की सबसे खास बात थीं सिद्धू-कान्हू और चांद-भैरव की झांकियां। इन झांकियों को इतनी खूबसूरती से सजाया गया था कि वे दूर से ही लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच रही थीं।
हर झांकी अपने आप में एक कहानी कह रही थी, एक इतिहास दोहरा रही थी।
इन जुलूसों में न सिर्फ बड़े-बुजुर्ग बल्कि छात्र-छात्राओं का भी जोश देखने लायक था। आदिवासी छात्र-छात्राएं अपनी पारंपरिक वेशभूषा में रैलियां निकाल रहे थे, नारे लगा रहे थे और अपनी संस्कृति पर गर्व महसूस कर रहे थे।
'सिद्धू-कान्हू अमर रहें!' और 'हूल क्रांति ज़िंदाबाद!' जैसे नारे हवा में गूँज रहे थे, जिससे पूरा शहर उत्सवमय हो गया था। ये बच्चे और युवा अपनी विरासत को सहेजने और उसे आगे बढ़ाने का संदेश दे रहे थे।
रैली सिद्धू-कान्हू मुर्मू पार्क पर आकर समाप्त हुई, जहाँ सभी ने मुख्य कार्यक्रम में हिस्सा लिया और शहीदों को याद किया।
श्रद्धांजलि और मिटिलो टावर का महत्व
पार्क में आयोजित कार्यक्रम के दौरान, आदिवासी समाज के लोगों ने अपने पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा-अर्चना की। यह सिर्फ एक पूजा नहीं थी, बल्कि अपने पूर्वजों और क्रांतिकारियों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का एक तरीका था।
लोगों ने क्रांतिकारियों की प्रतिमाओं पर फूल अर्पित किए, उनकी गाथाएं याद कीं और शपथ ली कि वे उनके आदर्शों पर चलेंगे। बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं भी इस आयोजन में शामिल हुए।
उनके लिए यह सिर्फ एक ऐतिहासिक घटना को याद करना नहीं था, बल्कि उससे प्रेरणा लेना भी था। उन्होंने शहीदों के योगदान को समझा और जाना कि कैसे उनके बलिदान ने आज के झारखंड की नींव रखी।
इस अवसर पर, लोगों ने सिद्धू-कान्हू पार्क परिसर में स्थित ऐतिहासिक मिटिलो टावर का भी दर्शन किया। मिटिलो टावर, जिसका हूल दिवस से गहरा संबंध है, लोगों के लिए खास महत्व रखता है।
यह टावर उस समय की गवाह है, जब इन वीर सपूतों ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका था। टावर के पास आकर लोगों ने उस संघर्ष को महसूस किया और उन लम्हों को याद किया, जब इस क्षेत्र में क्रांति की मशाल जली थी।
मिटिलो टावर को देखना और उसके इतिहास से रूबरू होना, हूल दिवस के इस पूरे अनुभव का एक अहम हिस्सा था, जिसने पाकुड़ के लोगों को अपने इतिहास और गौरव से फिर से जोड़ा। यह दिन सिर्फ यादें नहीं जगाता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को संघर्ष और स्वाभिमान का पाठ भी पढ़ाता है।


